आनंद पंचांग: भारतीय समाज में मां का स्थान सबसे ऊंचा है, भारतीय पौराणिक कथाओं की पांच ऐसी ही मांओं की अद्भुत… – Dainik Bhaskar

मां होना एक भाव है, एक परंपरा है, रिश्तों की सर्वोच्च गरिमा है। एक स्त्री में भिन्न-भिन्न तीन स्त्रियां होती हैं। बेटी, पत्नी और मां। बचपन रेंगकर बहू में, बहू पसरकर मां में उतर जाती है। इस बीच एक रिश्ता और है पत्नी का, जो एक प्रश्न पूछती रहती है- तू कौन है, तू कौन है…?
इसीलिए जब भी मां को याद किया जाए, विस्तार से दृश्य देखना पड़ेगा।
हमारे यहां ब्रह्मपुराण में पांच प्रात:स्मरणीय कन्याओं की चर्चा आती है। ये सब विवाहित हैं, लेकिन फिर भी इनको कन्या कहा गया है।
ये पांचों कन्याएं जिनको अहल्या, तारा, मंदोदरी, कुंती और द्रौपदी के रूप में जाना जाता है, अनूठी माताएं थीं। जीवन के विपरीत में से निकलकर अपनी संतानों को श्रेष्ठ बनाया था इन्होंने। इन पर विभिन्न तरह के आरोप लगे, लेकिन फिर भी इन्होंने अद्भुत कर्म किए। एक मां के साथ जीवन में जो संघर्ष होता है, वह सब इन्होंने देखा और फिर भी अपने मातृत्व का श्रेष्ठ प्रदान किया।
इन पांचों के पति बड़े लोग थे। बड़े लोगों की पत्नियों के साथ चुनौती और बढ़ जाती है, जब वे मां बनती हैं। इन्होंने जिस ढंग से जीवन जीया, उसे देखकर लगता है मातृत्व ही स्त्री का मोक्ष है।
तो आइए, इन पांचों माताओं में हम मजबूर, मंत्रणा, मर्मज्ञ, ममता और मंगल के दर्शन करेंगे।
अहल्या – मजबूर
अहिल्या की चर्चा तब आती है, जब श्रीराम विश्वामित्र के साथ जनकपुर जा रहे थे। महर्षि गौतम ने पत्नी अहल्या को शाप दिया था- तुम शिला यानी पत्थर हो जाओगी। कारण यह था कि अहल्या के सौंदर्य से प्रभावित होकर इंद्र ने छल करते हुए गौतम का रूप धरकर उनके साथ सहवास किया। यह बात जब महर्षि को पता चली तो उन्होंने दोनों को शाप दे दिया। गुनाह करने वाला भी मर्द और सज़ा देने वाला भी।
यह बात सही है कि पुरुष प्रधान समाज में पुरुष अपराध करके मुक्त हो जाता है और स्त्री को उसी अपराध का बोझ जीवनभर ढोना पड़ता है, जब तक कि कोई राम न आ जाए, और यह प्रतीक्षा बहुत भारी पड़ती है।
‘गौतम नारि श्राप बस उपल देह धरि धीर।
चरन कमल रज चाहति कृपा करहु रघुबीर।।’

अर्थात्, हे, रघुबीर, गौतम मुनि की पत्नी अहल्या शापवश पत्थर की देह धारण किए बड़े धीरज से आपके चरण कमलों की धूल चाहती है। इस पर कृपा कीजिए…। ऐसा विश्वामित्रजी ने राम से कहा था। -बालकांड दोहा 210।
राम एक ऐसे अवतार थे जिन्होंने हमेशा स्त्री-पुरुष के भेद को मिटाया। हर स्त्री को राम जैसी एक व्यवस्था की प्रतीक्षा करना पड़ती है, और यही उसका संघर्ष बन जाता है।
तारा – मंत्रणा
बालि की पत्नी तारा। बालि सुग्रीव का बड़ा भाई, जिसे राम ने मारा था। बालि अहंकारी था। अत्यधिक अहंकारी पुरुष की पत्नी होना और अंगद जैसे बच्चे को तैयार करना किसी भी मां के लिए बड़ी चुनौती है, पर तारा मंत्रणा देने में बड़ी माहिर थीं।
एक मां सही समय पर मंत्रणा दे दे तो संतान के लिए सुखद भविष्य की तैयारी हो जाती है। मां की मंत्रणा के लिए व्यवस्थित कक्षा नहीं होती है। मां तो चलते-फिरते एक छोटी-सी चपत या प्यारी-सी थपकी में गहरी मंत्रणा दे जाती है।
तारा, जिसे रामजी ने बालि के मरने के बाद समझाया था। हनुमानजी ने भी उनसे मंत्रणा की थी। तारा ने पति से कहा था-
‘सुनु पति जिन्हहि मिलेउ सुग्रीवा।
ते द्वौ बंधु तेज बल सींवा।’

अर्थात, सुग्रीव जिनसे मिले हैं, वे दोनों भाई तेज और बल की सीमा हैं। -किष्किंधा कांड 6-14
भविष्य पर नज़र रखकर मंत्रणा देने की कला तारा जानती थीं। इसीलिए अंगद जैसी संतान इस धरती पर आ सकी।
मंदोदरी – मर्मज्ञ
इसमें कोई संदेह नहीं कि मां कई बातों की विशेषज्ञ होती है। इतनी निष्णात कि पता भी नहीं चलता और किसी परिवार के लिए, अपनी संतानों के लिए इतनी बड़ी क्रांति कर जाती है। मंदोदरी मय दानव की कन्या थी, इनकी मां का नाम हेमा और पति विश्वविजेता रावण था। कौन-सा ऐसा दुर्गुण था, जो रावण में नहीं रहा हो। इसी कारण अपने पुत्रों को संभालने में मंदोदरी को बड़ी ताक़त लगी थी। लेकिन, चूंकि मर्मज्ञ थीं, इसलिए हर बार रावण जैसे व्यक्ति को भी समझाती रहीं।
‘रहसि जोरि कर पति पग लागी।
बोली बचन नीति रस पागी।।’

अर्थात, एकांत में पति के हाथ जोड़कर नीतिरस में पगी हुई वाणी बोलीं…। – सुंदरकांड 35/3
मंदोदरी ने एक बात सिखाई थी कि परिवार की परंपराओं के लिए मां को मर्मज्ञ होना पड़ेगा। ऐसा भी कहा जाता है कि पति के मनोरंजन के लिए इन्होंने एक खेल निर्मित किया था, जिसे शतरंज कहा जाता है। चौंसठ खाने और बत्तीस मोहरों का यह खेल सिर्फ़ गेम नहीं है। ज़िंदगीभर अलग-अलग ढंग से चलता है और इसमें एक मां प्यादे से लेकर बादशाह तक अलग-अलग भूमिका में रहती है। फिर इस मां का बच्चों के पिता से शह और मात का खेल ज़िंदगीभर चलता रहता है…।
कुंती – ममता
जिस दिन स्त्री भीतर की मां को मारती है, उस दिन परिवार से अपनापन, ममत्व, प्रेम और आत्मीयता समाप्त हो जाती है। कुंती ममता से भरी हुई थीं। उनके तीन पुत्र थे- युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन। नकुल तथा सहदेव उनकी सौत माद्री के पुत्र थे। लेकिन, कुंती की ममता इतनी विस्तारित थी कि दुनिया जान ही नहीं पाई कि कुंती के पांच नहीं, तीन बेटे थे। दुर्वासा ऋषि ने इन्हें देव आह्वान मंत्र दिया था और उसी से इनको संतानें हुई थीं।
विवाह पूर्व भी एक बार इन्होंने देव आह्वान मंत्र का प्रयोग किया था, जिससे कर्ण का जन्म हुआ था। इनकी ममता का जादू तो कृष्ण के सिर चढ़कर बोला था। कृष्ण जब भी बुआ कुंती को देखते तो सोचते थे भरे जंगल में तमाम अभावों के बीच इस मां ने पांच ऐसे बच्चे तैयार किए, जो धर्म का प्रतीक बन गए। बिना किसी को ध्वस्त किए ये वनसत्ता की सम्राज्ञी थीं।
अपनी बुआ कुंती को कृष्ण सदैव कहा करते थे- मैं आपके भीतर मां देखता हूं। सचमुच ममता की सुगंध कुंती की उपस्थिति मात्र से फैल जाती थी।
द्रौपदी – मंगल
द्रौपदी नाम के इस मंगलकारी व्यक्तित्व के साथ सबसे अनूठा, विरोधाभासी, रहस्यमयी और अनुत्तरित दृश्य यह है कि इनके पांच पति थे। और, ऐसी स्थिति के लिए सास कुंती तथा कृष्ण की भी सहमति थी।
कृष्ण कहा करते थे द्रौपदी का अर्थ ही मंगल है। जहां द्रौपदी है, वहां कल्याण, कुशल और आनंद है। दस भाइयों में इकलौती बहन थीं और कहती थीं मेरे ग्यारहवे भाई कृष्ण हैं। द्रौपदी के साथ मंगल जुड़ा ही इसीलिए था कि उन्होंने कृष्ण को भाई और सखा दोनों माना था। जिसके जीवन में परमात्मा हो, मंगल उसके भाग्य में उतर जाता है।
बिना कृष्ण के द्रौपदी ने कभी कोई निर्णय लिया ही नहीं। पांच पतियों की पत्नी होने के बाद भी इनका कौमार्य अखंडित था। इसीलिए द्रौपदी पूज्य हुईं।
सूत पूत्र कर्ण ने भरी सभा में जब द्रौपदी को वेश्या कहा था, तब ही द्रौपदी ने ये निर्णय ले लिया था एक दिन मैं इसका उत्तर अवश्य दूंगी।
प्रकट और अप्रकट शब्दों की जादूगरनी द्रौपदी ने अपने मंगल भाव से ही महाभारत जैसा महायज्ञ करवाया, जिसमें अधर्म को यह ज्ञात हो गया कि एक न एक दिन धर्म की अधर्म पर जीत होती ही है।
तो इन पांच माताओं के भीतर जीवन की विपरीत स्थितियों में जो ये पांच गुण समाए थे, वे आज भी हमारे आसपास, हमारी माताओं में दिख जाते हैं।
‘पंचकन्या: स्मरेत नित्यं महापातक नाशनम्’।
अर्थात, इन पांचों कन्याओं को प्रात:काल याद करने से पाप धुल जाते हैं। – ब्रह्मपुराण
अब यह बहस का विषय हो सकता है कि पाप भी कभी धुलते हैं? लेकिन, यदि हम इन पांच कन्याओं के महत्व को समझें, तो हम पाप का धुलना भी समझ जाएंगे।

अत: इन पंच प्रात:स्मरणीय कन्याओं के माध्यम से समूचे मातृत्व को नमन किया जाना चाहिए। क्योंकि मां को खंडित कर कोई मनुष्यता जीवित नहीं रह सकती…
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