जुबेर और भारत का समाज – Janta Se Rishta

आदित्य नारायण चोपड़ा; आल्ट न्यूज यू ट्यूब चैनल के सह संस्थापक मोहम्मद जुबेर को सर्वोच्च न्यायालय से सशर्त पांच दिन की जमानत सीतापुर मामले में मिल गई है परन्तु इसके साथ ही कई सवाल भी जुड़ गये हैं। पहला सवाल यह है कि समाज में धार्मिक मुद्दों पर एक पक्षीय ट्वीट करके किसी धर्म का मजाक उड़ाना या व्यंग्यात्मक तरीके से मजहब की मान्यताओं पर कटाक्ष करना या अन्य प्रकार से प्रचार करना क्या भारत जैसे बहुधर्मी विविधता वाले देश में स्वीकार्य हो सकता है? दूसरा सवाल यह है कि क्या सार्वजनिक रूप से हम किसी भी व्यक्ति को समाज के दो सम्प्रदायों के बीच नफरत फैलाने की इजाजत दे सकते हैं? तीसरा सवाल यह है कि क्या धर्मनिरपेक्षता के कथित झंडाबरदारों के लिए कटाक्ष करने के लिए केवल हिन्दू धर्म की मान्यताएं या देवी-देवता ही बचते हैं ? बेशक किसी फिल्म के दृष्टान्त को ही जुबेर ने हुमान होटल का नाम बदल कर हनीमून होटल करने का ट्वीट किया हो, मगर इससे पूरे हिन्दू जनमानस में व्यग्रता का वातावरण तो बन सकता है। मगर धर्मनिरपेक्षतावादियों को तब जाने क्यों मूर्छा आ जाती है जब हिन्दू के अलावा किसी दूसरे धर्म के बारे में बातचीत होती है। यह हिन्दुओं की उदारत ही है वह ऐसी विसंगतियों को अनदेखा करती रही है।इसकी एक वजह यह भी है कि हिन्दू धर्म किसी एक देवता या एक धार्मिक पुस्तक के अनुसार धार्मिक कृत्यों को नहीं करता है बल्कि इसके सैकड़ों ग्रन्थों व हजारों पूजा पद्धतियों में धर्म का भेद खोला जाता है। इस विधि को धर्म का विवरण कह सकते हैं जबकि अन्य धर्मों विशेषकर भारत से बाहर उत्पन्न हुए धर्मों में एकल पद्धति बतायी जाती है और उस पर अमल करना उस धर्म के अनुयायी के लिए जरूरी होता है। इस भेद को धर्मनिरपेक्षतावादी समझने में असमर्थ रहे हैं जिसकी वजह से वे भारत के लोगों को गलत पाठ पढ़ाते रहे हैं। धर्मनिरपेक्षतावादी के लिए क्या हिन्दू आलोचक होना जरूरी शर्त है? जुबेर के ट्वीटों व खबरों के पड़ताल करने के तरीके को देखा जाये तो उसे केवल हिन्दू धर्म में ही बुराई नजर आती थी। क्या यह अधिकार हिन्दू समुदाय का नहीं है कि वह स्वयं ही यह देखें कि उनके यहां क्या कुरीति है और क्या रूढ़ीवादिता है। सती प्रथा से लेकर बाल विवाह और मन्दिरों में बलि प्रथा से लेकर विधवा विवाह की कुरीतियों पर हिन्दू समाज के भीतर से ही आवाज उठी और इनमें संशोधन हुआ। परन्तु स्वयं को प्रगतिशील कहने वाले लोग तब मुंह पर ताले लगा कर बैठ जाते हैं जब काली देवी को सिगरेट पीते हुए दिखाया जाता है। दूसरी तरफ इस्लाम व ईसाई धर्मों के बारे में जब कोई विवाद उठता है तो यह वर्ग धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देकर उल्टे हिन्दुओं पर ही दोषारोपण शुरू कर देता है। मूल सवाल यह है कि हर हालत में संविधान का राज कायम रहना चाहिए और कानून का पालन होना चाहिए। खुद को प्रगतिशील व धर्मनिरपेक्ष कहने वाले लोग किसी अपराधी की अवैध सम्पत्ति पर बुल्डोजर चलाये जाने पर तो संविधान के संकट का ढिंढोरा पीटने लगते हैं मगर जब भारत की सड़कों पर हजारों लोगों का जुलूस सरेआम ‘सर तन से जुदा’ के नारे लगाता हुआ गुजरता है तो दीवार की तरफ मुंह करके खड़े हो जाते हैं। यह दोगलापन है जिसे भारत की जनता ने पहचान लिया है। संपादकीय :हमारी नई शिक्षा नीतिअमरनाथ में जल तांडवचीन की तिलमिलाहटशिंजो आबे : सायोनारा दोस्तदक्षिण भारत से ‘अलग’ स्वरदारू पार्टी, सैक्स स्कैंडल जानसन को ले डूबाभारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है और यहां ईशनिन्दा को संगीन अपराध नहीं बनाया जा सकता क्योंकि भारत में उन लोगों के भी समान अधिकार हैं जो ईश्वर की सत्ता पर विश्वास ही नहीं रखते। इन्हें हम नास्तिक कहते हैं। व्यक्तिगत जीवन में कोई भी व्यक्ति आस्तिक या नास्तिक हो सकता है। भारत की प्राचीन संस्कृति भी इसकी गवाह है क्योंकि यह व्यक्ति ही नहीं बल्कि धर्मों के भी अनीश्ववादी होने की परंपरा रही है। कोई भी आस्तिक या नास्तिक हिन्दू हो सकता है। उसके हिन्दू होने का अधिकार कोई नहीं छीन सकता क्योंकि संविधान उसे अपनी आस्था के अनुसार जीवन जीने का अधिकार देता है। क्या आज तक किसी एक भी धर्मनिरपेक्षतावादी ने भारत से कट्टरपंथ दूर करने के लिए तुर्की के राष्ट्रवादी नेता मुस्तफा कमाल अतातुरक का उदाहरण देने की जुर्रत की? ऐसा वे नहीं कर सकते क्योंकि वे जानते हैं कि ऐसा करते ही उनके खिलाफ जेेहाद की बातें होने लगेंगी मगर इसके विपरीत वे जेहादी तालसीबानों का समर्थन करने में शर्म महसूस नहीं करते। इस फर्क को हमें समझना चाहिए और भारत में वह रोशनी भरनी चाहिए जिससे सभी धार्मिक समाजों के सोच में वैज्ञानिक परिवर्तन आ सके। अतः जुबेर ने जो अपराध किया है उसकी जांच हर दृष्टि से होनी चाहिए जिससे भारत में धार्मिक सौहार्द के वातावरण को बिगाड़ने की कोई कोशिश न करे।
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