राष्ट्रीय सुरक्षा का फोकस तो पश्चिम से हटकर पूर्वी सीमा की तरफ हुआ, लेकिन चीन के साथ कारोबार में लगातार हो रहा है इजाफा – Navjivan

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रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने इस सप्ताह कहा कि केंद्र सरकार और आरबीआई दक्षिण एशियाई देशों के साथ आपसी कारोबार रुपए में करने की चर्चा कर रही है। इस बारे में और अधिक जानकारी सामने नहीं आई है, मसलन किन देशों के साथ बातचीत हो रही है और बातचीत किस स्तर पर पहुंची है।
लेकिन फिर भी इसे एक अच्छा कदम कहा जा सकता है, क्योंकि दक्षिण एशिया या फिर और साफतौर पर कहें तो अविभाजित भारत के लोग एक-दूसरे के साथ कारोबार न करके अपने आप को ही नुकसा पहुंचा रहे हैं।
विश्व बैंक कहता है कि दक्षिण एशियाई देशों का आपसी कारोबार इस क्षेत्र के कुल कारोबार का महज 5 फीसदी है। इसे आसियान क्षेत्र (इसमें ब्रुनई, कम्बोडिया, इंडोनेशिया, लाओ, मलेशिया, म्यांमार, फिलिपींस, सिंगापुर, थाईलैंड और वियतनाम शामिल हैं) से तुलना करें जिनका कुल अंतरक्षेत्रीय कारोबार 25 फीसदी है, यानी दक्षिण एशियाई कारोबार से पांच गुना ज्यादा है। जब आपस में कारोबार की बात आती है तो आसियान का इस विषय में तीन सूत्रीय एजेंडा है – आर्थिक एकीकरण, बहुस्तरीय व्यापार निम और सभी बाधाओं को धीरे-धीरे दूर करना।
इसके बरअक्स दक्षिण एशियाई देशों का कुल कारोबार वर्तमान में 23 अरब डॉलर है, जोकि कम से कम 67 अरब डॉलर के मौजूदा अनुमान से काफी कम है। और इस कारोबार में जो भी कमी है, उसमें हमारा नुकसान है। मान लो कि बांग्लादेश के साथ मौजूदा 18 अरब डॉलर के कारोबार में भारत का बांग्लादेश को निर्यात 16 अरब डॉलर है। पाकिस्तान को तो एक अरब डॉलर से भी कम निर्यात है और आयात तो 100 मिलियन डॉलर से भी कम है।
पाकिस्तान की कुल अर्थव्यवस्था हमारे उत्तर प्रदेश और बिहार के बराबर है, और बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था इससे बड़ी है। फिर भी हमने हमारे माल और सेवाओं के विस्तार के लिए प्रयास नहीं किए हैं। इसमें संदेह नहीं कि ऐसा करने के लिए हमें हमारी सीमाएं खोलनी होंगी, और समस्या की जड़ यहीं है।
विश्व बैंक कता है कि “सीमाई चुनौतियों का अर्थ है कि भारत की किसी कंपनी को ब्राजील के साथ कारोबार करना अपने किसी दक्षिण एशियाई पड़ोसी के साथ कारोबार करने के मुकाबले 20 फीसदी सस्ता पड़ता है।” जिन चुनौतियों की बात हो रही है वह बहुत ही बुनियादी हैं। इनमें से कुछ तो समझ में आते हैं, जैसे कि सड़क और हवाई मार्ग के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी होना आदि। पाकिस्तान के साथ कारोबा के लिए सबसे सुगम और आर्थिक रास्ता सड़क मार्ग का है। दोनों देशों को बीच एकमात्र चालू रेल मार्ग वाघा बॉर्डर से होकर है। लेकिन बीते 4 साल से दोनों देशों के बीच रेल और हवाई संपर्क बंद पड़ा है।
कोलकाता से जो माल पाकिस्तान जाता है उसे जल मार्ग से सिंगापुर होते हुए भेजा जाता है।
दूसरी समस्या प्रोटेक्टिव टैरिफ की है यानी ऐसे सामान के आयात पर अधिक शुल्क लगाना है जोकि घरेलू उत्पादन का हिस्सा है। पाकिस्तान को सड़क मार्ग से भेजे जाने वाले माल में सिर्फ 137 उत्पाद ही शामिल हैं। 2019 में पुलवामा आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान के माल पर सीमा शुल्क बढ़ाकर 200 फीसदी कर दिया था।
इसके अलावा शुल्क के अलावा भी बाधाएं हैं, जिनमें कारोबारोयं और आयात-निर्यात करने वालों को वीजा देना शामिल हैं। निवेश पर पाबंदियां और आम संदेह के चलते भी कारोबार पर असर पड़ता है।
वैसे जब दोनों देशो के बीच ट्रेन चल रही थी, तब भी समस्याएं थीं। अटारी से अमृतसर तक आने वाली बोगियों की संख्या सीमित थी। इसके बाद भुगतान की समस्या थी। ऋण पत्र (लेटर ऑफ क्रेडिट) जोकि किसी बैंक से गारंटी के तौर पर जारी होते हैं और जिसके मुताबिक यह वादा होता है कि खरीदार माल बेचने वाले को समय पर और सही रकम का भुगतान कर देगा। लेकिन पाकिस्तानी बैंकों से जारी होने वाले लेटर ऑफ क्रेडिट को भारत में स्वीकार नहीं किया जाता है और वहां भी ऐसा ही है।
भारत-पाकिस्तान के बीच सड़क मार्ग से आने वाले माल के लिए ई-फाइलिंग के जरिए कस्टम क्लीयरेंस की सुविधा नहीं है। शिकायतें यह भी हैं कि हमारे कस्टम अधिकारी कुछ खास किस्म की समस्य भी खड़ी करते हैं। आमतौर पर यह समस्याएं सुरक्षा के नाम पर माल को लंबे समय तक पड़ा रहने को लेकर हैं। जब मैं 2014 में सड़क मार्ग से पाकिस्तान गया था तो मैंने देखा था कि ट्रकों की लंबी कतार लगी है, लेकिन उनके चलने का कोई संकेत नजर नहीं आया।
भारत अपने इलाके से पाकिस्तानी ट्रकों को बांग्लादेश या नेपाल जाने का रास्ता भी नहीं देता है। इससे यह संकेत तो मिलता ही है कि हमारी चिंता सिर्फ सुरक्षा ही नहीं है बल्कि यह भी है कि हम पाकिस्तान के साथ कारोबार नहीं करना चाहते भले ही इससे हमारे निर्यात पर ही असर क्यों न पड़े।
दरअसल कारोबार को लेकर यही मानसिकता है जिससे स्थितियां ऐसी हैं और इसीलिए मैंने कहा कि सीमा पार आपसी कारोबार एक अच्छा विचार है। लेकिन सवाल है कि क्या हमने इसके दो मायने हैं। पहला तो यह कि जो हम लेते हैं, क्या हमें वह देना भी पड़ेगा। बीते समय में लेनदेन की बराबरी नहीं थी। यही कारण है कि हमारा कारोबार काफी कम हुआ, जैसाकि विश्व बैंक ने कहा है। और दूरसा कारण है कि हमें उस मानसिकता को छोड़ना होगा कि हम एक दुश्मन देश के साथ व्यापार कर रहे हैं।
भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा का केंद्र बिंदु बीते दो-ढाई साल में पश्चिमी सीमा से हटकर पूर्वी सीमा की तरफ हुआ है लेकिन चीन के साथ हमारा कारोबार और व्यापार बढ़ता ही रहा है। यह कारोबार हमारे हितों के विरुद्ध है, क्योंकि इसमें अधिकतर तो चीन से आयातित सामान ही है। जनवरी से नवंबर 2022 में चीन से आयात पिछले साल के मुकाबले 24 फीसदी बढ़कर 108 अरब डॉलर का हो गया। वहीं चीन को हमारा निर्यात 38 फीसदी गिरकर 16 अरब डॉलर पर आ गया। फिर भी हम चीन के साथ कारोबार जारी रखे हुए हैं, इसके बावजूद कि सरकार समेत सभी मानते हैं कि हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा को पहला खतरा चीन से है। दूसरी तरफ हमने दूसरे पड़ोसियों के साथ अपने रुख में बदलाव किया है, लेकिन किन्हीं कारणों से हमारे रवैये में बदलाव नहीं आया है।
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